बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की भविष्यवाणियों का परिणाम
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रसिद्ध चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने दो महत्वपूर्ण भविष्यवाणियां की थीं। पहली, अपनी नई पार्टी जन सुराज के लिए और दूसरी, जेडीयू (Janata Dal United) के प्रदर्शन को लेकर। अपने राजनीतिक करियर में कभी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके किशोर ने अपनी पार्टी के बारे में कहा था कि यह या तो ऊंचाइयों पर जाएगी या फिर फर्श पर आ जाएगी। इस बार उनके इस दावे को कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा। वहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि जेडीयू 25 से अधिक सीटें नहीं जीत पाएगी, जो अब उनके समर्थकों और जेडीयू के नेताओं के लिए मज़ाक का विषय बन गई है।
जेडीयू का शानदार प्रदर्शन और प्रशांत किशोर की पार्टी की स्थिति
वास्तव में, जेडीयू का प्रदर्शन इस बार 80 से अधिक सीटों पर पहुंचता दिख रहा है, जो 2010 के बाद का सबसे अच्छा परिणाम है। उस समय पार्टी ने 100 से अधिक सीटें जीती थीं, हालांकि उस चुनाव में उसने अधिक उम्मीदवार उतारे थे। इस बार, जेडीयू ने केवल 101 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की स्थिति बहुत ही खराब रही। पार्टी ने पूरे 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का प्रयास किया, लेकिन नामांकन दाखिल न कर पाने के कारण उसने भाजपा (BJP) के केंद्रीय नेताओं जैसे अमित शाह (Amit Shah) को जिम्मेदार ठहराया। परिणामस्वरूप, पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और अधिकांश प्रत्याशियों की जमानत भी नहीं बच सकी।
आगे का रास्ता और राजनीतिक अनुभव
प्रशांत किशोर ने लगभग एक वर्ष पहले अपनी नई पार्टी की शुरुआत की थी, जिसके बाद उन्होंने बिहार के हर कोने में पदयात्राएं कीं। इन प्रयासों के बाद पार्टी को व्यापक प्रचार मिला, लेकिन चुनावी परिणाम निराशाजनक रहे। किशोर को अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने लोकसभा चुनावों में भाजपा को 300 से अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया था, लेकिन उनका मानना है कि भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों से जूझ रही है, वहां विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी। उनका यह कथन कि ‘कमजोर विपक्ष नहीं है, बल्कि विपक्ष में मौजूद पार्टियां कमजोर हैं’, चुनावी विश्लेषण में काफी चर्चित रहा है।
उनके पास अभी भी कई विकल्प मौजूद हैं। आई-पैक (India-PAC) के संस्थापक के रूप में उनकी रणनीतियों का लाभ कई बड़े नेताओं को मिला है, जैसे नरेंद्र मोदी (Narendra Modi), नीतीश कुमार (Nitish Kumar), ममता बनर्जी (Mamata Banerjee), अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal), जगन मोहन रेड्डी (Jagan Mohan Reddy), उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) और एम. के. स्टालिन (M. K. Stalin)। हालांकि, उनके सभी अभियान सफल नहीं रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि किशोर इन बातों को स्वीकार करना पसंद नहीं करते, लेकिन उम्र के साथ उनके पास नई संभावनाएं हैं। बिहार में इंडिया गठबंधन (India Alliance) की हार के बाद, उनके पास अपनी राजनीतिक रणनीतियों को फिर से परखने का मौका है, खासकर अपनी पार्टी के माध्यम से।









