आतंकवाद का नया चेहरा: शिक्षित और प्रोफेशनल जिहादी
साल 2008 में मुंबई के ताज होटल पर हुए आतंकवादी हमले के बाद से यह धारणा मजबूत हुई थी कि आतंक के पीछे गरीब और वंचित परिवारों का हाथ होता है। उस समय कहा जाता था कि इन आतंकियों को गरीबी, लालच या ब्रेन वाशिंग के माध्यम से जिहादी बनाया जाता है, और वे फिदायीन हमले से पहले सोचने का भी समय नहीं पाते।
हालांकि, बीते कुछ वर्षों में इस सोच में बदलाव देखने को मिला है। अब यह माना जाने लगा है कि आतंकवाद के पीछे केवल गरीबी या गरीबी से जुड़ी परिस्थितियां ही नहीं हैं, बल्कि शिक्षित और प्रोफेशनल वर्ग भी इस जाल में फंस सकता है। दिल्ली ब्लास्ट जैसी घटनाओं के बाद व्हाइट कॉलर टेररिज्म पर नई बहस शुरू हो गई है, जिसमें 2001 से 2025 तक की आतंकी घटनाओं में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और पत्रकार जैसे उच्च शिक्षित लोग भी शामिल पाए गए हैं।
शिक्षित जिहादी और आतंक के नेटवर्क का विस्तार
2025 में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. मुजम्मिल शकील को गिरफ्तार किया, जिनके कमरे से 360 किलो अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ, जो बड़े हमले की आशंका को दर्शाता है। उनके साथ लखनऊ की डॉक्टर शाहीन शाहिद की कार से AK-47 राइफल भी मिली, और दोनों के जैश-ए-मोहम्मद तथा अंसार गजवत-उल-हिंद से संबंध पाए गए।
इसी साल सहारनपुर से जम्मू-कश्मीर के काजीगुंड के रहने वाले पूर्व सीनियर रेजिडेंट डॉ. आदिल अहमद राथर को गिरफ्तार किया गया, जिन पर जैश नेटवर्क को पुनर्जीवित करने का आरोप है। पुणे के डॉ. अदनान अली, जो एनेस्थीसिया विशेषज्ञ हैं, को ISIS से जुड़े मॉड्यूल का हिस्सा माना गया, और उनके घर से ISIS के दस्तावेज और डिजिटल सबूत मिले। झारखंड के डॉ. इश्तियाक पर अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) का मॉड्यूल चलाने का आरोप है, जबकि महाराष्ट्र के डॉ. उसामा शेख गजवा-ए-हिंद की साजिश रच रहे थे।
तकनीक और शिक्षित आतंकियों का बढ़ता प्रभाव
पुणे के QA इंजीनियर जुबैर हंगरगेकर, जो अल-कायदा के “डिजिटल जिहाद” से जुड़े थे, झारखंड के माइनिंग इंजीनियर शहनवाज़ आलम, और IIT मुंबई के केमिकल इंजीनियर अहमद मुर्तज़ा अब्बासी जैसे शिक्षित लोग भी आतंक के नेटवर्क में शामिल पाए गए हैं। इन सभी का संबंध विभिन्न आतंकी संगठनों जैसे जैश-ए-मोहम्मद, इंडियन मुजाहिदीन और अल-कायदा से रहा है।
शिक्षा प्राप्त करने वाले इन जिहादियों का नेटवर्क अब केवल झुग्गियों या पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं है। बल्कि, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़े-लिखे लोग भी आतंक की राह पर हो सकते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि जब शिक्षा मानवता से दूर हो जाती है, तो ज्ञान भी विनाशकारी हथियार बन सकता है।











