कार्तिक पूर्णिमा का महत्व और तिथि
2025 में कार्तिक पूर्णिमा की तिथि 4 नवंबर की रात 10:36 बजे से शुरू होकर 5 नवंबर की शाम 6:48 बजे तक रहेगी। यह विशेष दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसे देव दीपावली के रूप में भी मनाया जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन का विशेष महत्व गंगा स्नान और दीपदान में निहित है।
कार्तिक पूर्णिमा पर धार्मिक अनुष्ठान और शुभ कार्य
इस पावन अवसर पर गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह पापों का नाश कर मन को शुद्ध करता है। शाम के समय भगवान शिव और विष्णु के नाम से दीप जलाना भी अत्यंत फलदायी होता है। घर, मंदिर या नदी किनारे दीपदान करने से सुख और समृद्धि का वास होता है। साथ ही, इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करना भी पुण्यदायक माना जाता है। भगवान शिव, विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा और व्रत भी इस दिन किए जाते हैं, जो आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। मंत्र जाप जैसे “ॐ नमः शिवाय” और “ॐ नारायणाय नमः” का पाठ भी शुभ फल देता है।
क्या करें और क्या न करें: कार्तिक पूर्णिमा के नियम
इस पावन दिन क्रोध और कटु वाणी से बचना चाहिए, क्योंकि मन, वचन और कर्म को पवित्र रखना आवश्यक है। मांस, मछली और तामसिक भोजन से परहेज करें, और केवल सात्त्विक आहार ग्रहण करें। झूठ बोलने या दूसरों की निंदा करने से बचें, क्योंकि सत्य और सम्मान इस दिन का मुख्य आधार हैं। गंगा या नदी के जल को प्रदूषित न करें और दीपक को स्वयं बुझाने या लापरवाही से बुझने से भी बचें, क्योंकि यह अशुभ संकेत माना जाता है।
क्या है जरूरी और क्या नहीं: कार्तिक पूर्णिमा की विशेष बातें
गंगा स्नान इस दिन अत्यंत आवश्यक माना जाता है, क्योंकि इससे पापों का नाश और आत्मा की शुद्धि होती है। कई भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। दीपदान का सबसे शुभ समय शाम के प्रदोषकाल (लगभग 5:15 बजे से 7:50 बजे) के बीच माना गया है। साथ ही, यह भी ज्ञात है कि देव दीपावली भी इसी दिन मनाई जाती है, जब गंगा किनारे दीप जलाए जाते हैं। इस दिन की पूजा और अनुष्ठान से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।











