कार्तिक पूर्णिमा का महत्व और परंपराएँ
कार्तिक पूर्णिमा हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र और शुभ दिन माना जाता है, जो हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस तिथि पर भगवान विष्णु, भगवान शिव और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन स्नान, दान और दीपदान का विशेष महत्व है, क्योंकि इन्हें शुभ फल प्राप्ति का माध्यम माना जाता है। इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था। मान्यता है कि इस दिन पूजा और दीपदान करने से पाप धुलते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।
365 दीपकों का जलाना और उसकी मान्यताएँ
कहते हैं कि यदि कार्तिक पूर्णिमा की रात 365 दीपक जलाए जाएं, तो पूरे वर्ष जीवन में सुख, समृद्धि और प्रकाश बना रहता है। ये 365 दीपक वर्ष के हर एक दिन का प्रतीक हैं। हर दीपक जलाने का अर्थ है जीवन के अंधकार, दुख और नकारात्मकता को दूर करना। यह केवल पूजा का हिस्सा नहीं है, बल्कि आत्मा को शांति और मन को सकारात्मकता से भरने का भी एक तरीका है।
दीपदान की विधि और शुभ मंत्र
इस पावन दिन सुबह स्नान कर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की पूजा करें। उसके बाद 365 दीपक घर के मंदिर, तुलसी के पौधे के पास, दरवाजे, छत, आंगन या नदी किनारे रखकर जलाएं। हर दीपक में शुद्ध घी या तिल का तेल होना चाहिए। दीप जलाते समय “ॐ नमो नारायणाय” या “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। दीपदान से पहले भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
दीपदान के लाभ और धार्मिक महत्व
कार्तिक पूर्णिमा की रात दीपदान करने से जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता का वास होता है। घर में नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, धन की स्थिति मजबूत होती है और परिवार में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। यह परंपरा हमारे पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए भी अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। दीपक जलाने का यह कर्म जीवन के अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाने का प्रतीक है, जो मन और जीवन दोनों को उज्जवल बनाता है।









