बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव की नई सियासी रणनीति
बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने अपनी राजनीतिक चालबाजी से महागठबंधन को मजबूत करने का प्रयास किया है। उन्होंने अपने कोर वोटबैंक यादव समाज को बनाए रखते हुए, पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों को भी अपने साथ जोड़ने का नया फॉर्मूला अपनाया है। यह रणनीति उस तरीके से मेल खाती है, जिस तरह से अखिलेश यादव ने 2024 के उत्तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी को हराने के लिए अपने वोटबैंक को मजबूत किया था।
महागठबंधन की सामाजिक इंजीनियरिंग का जाल
महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर, साथ ही मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम पद का उम्मीदवार बनाकर, बिहार की राजनीति में नई दिशा दी है। इस कदम के तहत मल्लाह और अन्य पिछड़ी जातियों को आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। साथ ही कुशवाहा समुदाय से भी तेजस्वी ने कई उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जो परंपरागत रूप से बीजेपी और जेडीयू का वोटबैंक माना जाता है। इस सामाजिक समीकरण का उद्देश्य बिहार में 4 प्रतिशत वोटों के अंतर को समाप्त कर सत्ता में वापसी सुनिश्चित करना है।
सामाजिक समीकरण और सीटों का बंटवारा
बिहार में करीब 30 विधानसभा क्षेत्रों में निषाद समुदाय का प्रभाव है, जबकि यादव वोटरों की संख्या लगभग 15 प्रतिशत है। महागठबंधन ने इन जातियों को ध्यान में रखते हुए अपने उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाई है। कुशवाहा या कोइरी जाति बिहार की कुल आबादी का 4.21 प्रतिशत है, और इस बार तेजस्वी यादव ने लगभग एक दर्जन उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इससे पहले भी कुशवाहा समाज को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की मांग तेजस्वी ने उठाई है, ताकि अपने राजनीतिक आधार को मजबूत किया जा सके।









