बिहार में चिराग पासवान की राजनीतिक यात्रा का बदलाव
बिहार की राजनीति में चिराग पासवान की भूमिका पिछले पांच वर्षों में पूरी तरह से बदल गई है। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने एनडीए से अलग होकर अपनी अलग राह चुनी थी, जिसमें उन्होंने नीतीश कुमार की जेडीयू को बड़ा झटका दिया था। उस समय, उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को 135 सीटों पर उतारा था, जिनमें से कई जेडीयू के कोटे की सीटें भी थीं। हालांकि, उस चुनाव में उनकी पार्टी केवल एक सीट जीत सकी, लेकिन उन्होंने जेडीयू की सियासी स्थिति को कमजोर कर दिया।
2020 के चुनाव का प्रभाव और उसकी परिणति
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी ने महज एक सीट पर जीत हासिल की, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक था। उनके वोटों ने जेडीयू को 25 सीटें हारने पर मजबूर कर दिया और तीसरे स्थान पर ला खड़ा किया। इस चुनाव में उनके वोटों का बिखराव जेडीयू के नुकसान का मुख्य कारण बना, जिससे नीतीश कुमार की पार्टी का सियासी कद घट गया। उस समय, उनके वोटों का बड़ा हिस्सा तेजस्वी यादव की आरजेडी और कांग्रेस को मिला, जिससे विपक्षी गठबंधन को फायदा हुआ।
वापसी और फिर से मजबूत स्थिति
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में चिराग पासवान ने अपनी स्थिति मजबूत की है। उन्होंने फिर से एनडीए में वापसी की और जेडीयू के साथ मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में, उन्होंने अपने कोटे की सभी पांच सीटें जीत लीं, जबकि जेडीयू और बीजेपी ने भी अपनी-अपनी सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की। इस तरह, एनडीए ने बिहार में अपनी स्थिति फिर से मजबूत कर ली है, और चिराग पासवान की भूमिका फिर से सियासी परिदृश्य में अहम हो गई है।
2025 के बिहार चुनाव में चिराग पासवान की रणनीति और संभावनाएं
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने अपनी रणनीति बदलते हुए एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उन्हें इस बार 29 सीटें मिली हैं, जबकि जेडीयू और बीजेपी ने क्रमशः 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इस बार, चिराग पासवान जेडीयू के खिलाफ नहीं बल्कि उनके साथ मिलकर मैदान में हैं, जिससे वोट बिखराव का खतरा कम हो गया है। इससे पहले के मुकाबले, दोनों पार्टियों के समर्थकों के बीच टकराव की संभावना भी कम हो गई है।
चिराग पासवान का राजनीतिक आधार और जातीय समर्थन
चिराग पासवान अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जो बिहार में दलित राजनीति के प्रमुख चेहरे थे। उनके समर्थक मुख्य रूप से दुसाध समाज से हैं, जिनकी आबादी बिहार में लगभग 5.31 प्रतिशत है। यह समुदाय बिहार की करीब 20 से 25 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। चिराग का समर्थन इस समुदाय में बहुत मजबूत माना जाता है, और उनके वोट सीधे तौर पर उनकी जीत या हार का फैसला कर सकते हैं।
लोकप्रियता और राजनीतिक रणनीति
विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में चिराग पासवान की लोकप्रियता और उनकी सियासी पकड़ इस चुनाव में निर्णायक साबित हो सकती है। उन्होंने अपने को जाति विशेष तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि बिहारी अस्मिता, रोजगार, और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है। उनका नारा ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ युवाओं और नए वोटरों को आकर्षित करने का प्रयास है।
नीतीश कुमार और चिराग पासवान के बीच नई समीकरण
पिछले दिनों छठ महापर्व के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चिराग पासवान के घर जाना इस बात का संकेत है कि दोनों के बीच पुराने मतभेद अब पीछे छूट गए हैं। यह मुलाकात न केवल एनडीए के भीतर एकता का संदेश है, बल्कि महागठबंधन के लिए भी एक बड़ा संकेत है। नीतीश कुमार ने स्पष्ट किया है कि वे अभी भी मुख्यमंत्री रहेंगे, और इस मुलाकात ने यह साबित कर दिया कि दोनों नेता अब एक साथ मिलकर बिहार की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।









