छठ पूजा 2025 का महत्व और परंपराएँ
छठ पर्व, जो चार दिनों तक चलता है, पूरी तरह से छठी माता और सूर्य देव की पूजा के लिए समर्पित है। यह महापर्व नहाय-खाय के साथ शुरू होता है, जिसमें श्रद्धालु अपने विश्वास और आस्था के साथ व्रत रखते हैं। आज के दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रती महिलाएं सूर्यास्त के समय डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगी और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगी। इस पर्व का मुख्य आकर्षण सूर्य की पूजा है, जो जीवन और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का समय और महत्व
छठ पर्व के तीसरे दिन यानी 27 अक्टूबर को शाम 5:40 बजे सूर्यास्त के समय डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद अगले दिन 28 अक्टूबर को सुबह 6:30 बजे उगते सूर्य को अर्घ्य देकर इस चार दिवसीय पर्व का समापन किया जाएगा। इस व्रत में श्रद्धा, संयम और आस्था का विशेष महत्व है, और माना जाता है कि इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सूर्य को अर्घ्य देने का यह समय विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि यह जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि लाने का प्रतीक है।
सूर्य पूजा का वैज्ञानिक और धार्मिक आधार
छठ पर्व का इतिहास सूर्य उपासना का प्राचीन और वैज्ञानिक रूप से मान्य तरीका है। हिंदू धर्म में सूर्य को जीवन और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। इस पर्व में न केवल सूर्य के उगते बल्कि डूबते सूर्य की भी पूजा की जाती है, जो इसे अन्य त्योहारों से अलग बनाता है। मान्यता है कि सूर्य की बहन छठी माता भी इस पर्व से जुड़ी हैं। सूर्य की पूजा कर छठी माई को प्रसन्न किया जाता है, जिससे जीवन में रोग, दुःख और बाधाएं दूर होती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ संध्या के समय रहते हैं, इसलिए सूर्यास्त के समय सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य देना विशेष फलदायी माना जाता है। इससे व्रती को दोगुना पुण्य प्राप्त होता है, क्योंकि यह सूर्य के अस्त होने और फिर उगने दोनों की पूजा है।











