अफगानिस्तान में भारत की मानवीय पहल का प्रभाव
सच्चे दिल से मदद करने वाले का नाम सदियों तक इतिहास में दर्ज होता है। आज भारत ने उस कहावत को फिर से साबित कर दिखाया है, जब उसने अफगानिस्तान की धरती पर अपनी मानवता का परिचय दिया। उस क्षेत्र में जहां पहले गोलियों की आवाजें गूंजती थीं, अब भारत की सहायता और करुणा की आवाज सुनाई दे रही है। अफगानिस्तान, जहां अमेरिका ने अपने अरबों डॉलर और सपनों को दफन कर दिया था, वहां अब भूख, डर और बारूद की गंध ही बची थी। लोगों के चेहरे निराशा और हार के भाव से भरे हुए थे। लेकिन अब वही जमीन भारत की भरोसेमंद मदद से नई उम्मीदों का सवेरा देख रही है।
राहत सामग्री के साथ भारत का मानवीय मिशन
जब अफगानिस्तान में प्राकृतिक आपदा और अकाल ने तबाही मचाई, तब विश्व के बड़े देश अपने-अपने बयानों और बैठकों में उलझे रहे। इसके विपरीत, भारत ने रातों-रात 40 ट्रकों का एक राहत काफिला रवाना किया, जिसमें गेहूं, दालें, दवाइयां, टेंट और मानवता का जज्बा भरा था। इन ट्रकों की रफ्तार में राहत नहीं बल्कि आशा की किरणें थीं। काबुल की सड़कों पर जब ये ट्रक पहुंचे, तो वहां के बच्चों ने खुशी से कहा कि अब भारत आया है। बच्चों की आंखों में चमक लौट आई, महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान खिल गई और अफगान गलियों में ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ की आवाजें गूंजने लगीं। भारत ने न तो कोई प्रचार किया और न ही कोई घोषणा, बल्कि चुपचाप मदद का हाथ बढ़ाया। यही भारत की ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ है, जो दिलों को जीतने का काम करती है।
कूटनीति और मानवीय सहायता का अनूठा मेल
जब विदेश मंत्री एस जयशंकर की मुलाकात तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी से हुई, तो पूरी दुनिया की नजरें उस छोटे से कमरे पर टिकी थीं। अमेरिका, जो तालिबान से बातचीत करने से डरता था, भारत वहां विश्वास की डोर मजबूत कर रहा था। मुत्ताकी ने कहा कि भारत ने बिना किसी स्वार्थ के अफगानिस्तान का साथ दिया है, जो भारत की कूटनीतिक जीत का प्रतीक है। भारत पहले ही अफगानिस्तान को 20 एंबुलेंस उपहार में दे चुका है और अब एमआरआई व सीटी स्कैन मशीनें भेजने की योजना बना रहा है। जब बाकी देश चेतावनी देने में लगे थे, तब भारत अस्पताल और स्कूलों का निर्माण कर रहा था, भूखे बच्चों को रोटी खिला रहा था। यह केवल राहत कार्य नहीं था, बल्कि दिलों को जीतने वाली एक प्रभावशाली डिप्लोमेसी थी। भारत ने दिखा दिया कि असली ताकत हथियारों में नहीं, बल्कि मानवता में होती है। रूस ने भारत के इस कदम को मानवता की मिसाल माना है, वहीं चीन भी सतर्क हो गया है, क्योंकि उसे समझ आ गया है कि भारत का यह दिलों में उतरने वाला मॉडल उसके बेल्ट एंड रोड (Belt and Road) परियोजना से कहीं अधिक प्रभावशाली है। अमेरिकी थिंक टैंक भी मानने लगे हैं कि भारत की यह नीति एशिया की नई धुरी बन सकती है।











