दिल्ली में सर्दियों के साथ बढ़ रहा प्रदूषण का स्तर
जैसे ही दिल्ली में सर्दियों का मौसम शुरू होता है, वायु गुणवत्ता में तेजी से गिरावट देखने को मिलती है। गुरुवार को शहर की हवा की गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में पहुंच गई, जबकि आनंद विहार क्षेत्र में स्थिति और भी खराब रही। दिवाली के बाद से दिल्ली की वायु प्रदूषण स्तर और भी अधिक बढ़ गया है, और हवा की धीमी गति ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
प्रदूषण से निपटने के लिए नई तकनीक का प्रयोग
ऐसे में राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के इलाकों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अब कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) का सहारा लिया जाएगा। इस प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए सेसना का विशेष एयरक्राफ्ट कानपुर से मेरठ के लिए रवाना हो चुका है। सूत्रों के अनुसार, बादलों की अनुकूल स्थिति को देखते हुए, शुक्रवार से शुरू होकर अगले तीन दिनों में यानी 72 घंटों के भीतर क्लाउड सीडिंग की संभावना है।
कृत्रिम बारिश का इतिहास और वर्तमान प्रयास
भारत में नकली बादलों से बारिश कराना कोई नई बात नहीं है। आर्टिफिशियल तरीके से बारिश कराने का प्रयोग 1951 से अब तक कई बार किया जा चुका है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (Indian Institute of Tropical Meteorology) के वैज्ञानिक भी इस बात की पुष्टि करते हैं। विश्व में पहली बार 1946 में अमेरिका ने कृत्रिम बारिश का प्रयोग किया था।
क्लाउड सीडिंग का वैज्ञानिक तरीका और दिल्ली में कैसे होगी प्रक्रिया
कृत्रिम वर्षा कराने के लिए क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें बादलों में पानी की बूंदें बनाने के लिए सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस और क्लोराइड का इस्तेमाल किया जाता है। विमानों को बादलों के बीच से गुजारकर इन रसायनों को छोड़ा जाता है, जिससे पानी की बूंदें जम जाती हैं और बारिश के रूप में जमीन पर गिरती हैं। यह प्रक्रिया तभी सफल होती है जब वायुमंडल में पर्याप्त मात्रा में बादल और नमी मौजूद हो।
दिल्ली में कैसे होगी कृत्रिम बारिश की प्रक्रिया
दिल्ली में कृत्रिम बारिश के लिए विशेष तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसे पाइरोटेक्निक कहा जाता है। इस तकनीक में एयरक्राफ्ट की दोनों विंड्स के नीचे 8 से 10 पॉकेट (पायरोटेक्निक फ्लेयर्स) रखे गए हैं। इन फ्लेयर्स में मौजूद केमिकल्स को बादलों के नीचे विस्फोट कर दिया जाएगा, जिससे संघनन बढ़ेगा और बारिश होगी। यह प्रक्रिया लगभग 100 किलोमीटर की रेंज में प्रभावी हो सकती है, जिससे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है।
पूर्व में भी दिल्ली में किया गया था कृत्रिम बारिश का प्रयास
दिल्ली की पूर्व सरकार ने भी प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश का प्लान बनाया था। आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में काम किया था, जिसमें क्लाउड सीडिंग के जरिए धुंध को कम करने का प्रस्ताव था। पर्यावरण मंत्रालय ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी, लेकिन कुछ कारणों से यह योजना पूरी नहीं हो सकी।










