क्लाउड सीडिंग क्या है और इसकी प्रक्रिया
क्लाउड सीडिंग एक सदियों पुरानी तकनीक है, जिसमें विशेष ‘बीज’ कणों का उपयोग कर बादलों को संशोधित किया जाता है ताकि बारिश हो सके। यह विधि लगभग 75 वर्षों से विकसित हो रही है, जिसमें मुख्य रूप से सिल्वर आयोडाइड जैसे रासायनिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। इन बीज कणों का कार्य पानी की वाष्प को आकर्षित करना है, जिससे बादल के अंदर पानी के बूंदें बनती हैं। जब ये बूंदें भारी हो जाती हैं, तो वे बारिश के रूप में नीचे गिरने लगती हैं।
प्रक्रिया का मुख्य आधार और उपकरण
इस तकनीक में बीज कणों को बादल में डालने का सबसे प्रभावी तरीका विमान या ड्रोन का उपयोग है। अक्सर विमान के पंखों पर लगे फ्लेयर के माध्यम से इन बीजों को बादल के आधार या अंदर छोड़ा जाता है। इससे बादल में आवश्यक मात्रा में पानी के बूंदें बनती हैं, जो बारिश का कारण बनती हैं।
सही मौसम की स्थिति और आवश्यकताएँ
क्लाउड सीडिंग के लिए सबसे जरूरी है कि बादल मौजूद हों और उनमें पर्याप्त नमी हो। इसके साथ ही, बादल की ऊर्ध्वाधर मोटाई, हवा की गति और वायु प्रवाह का सही होना भी जरूरी है। CAIPEE (Central Agency for Ice and Precipitation Enhancement) के अनुसार, एक किलोमीटर से कम ऊंचाई वाले बादल में इस प्रक्रिया को नहीं किया जा सकता। तेज हवाएँ इस योजना को विफल कर सकती हैं।
सही मौसम की स्थिति और प्रभावकारिता
बादल में नमी का स्तर, ऊर्ध्वाधर वायु प्रवाह और बादल की ऊंचाई इस तकनीक की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से, ऊर्ध्वाधर वायु प्रवाह वाले बादल, जो अपने भीतर ऊपर उठने की क्षमता रखते हैं, सबसे उपयुक्त होते हैं। जैसे-जैसे बादल ऊंचाई पकड़ते हैं, तापमान गिरता है, जिससे पानी के बूंदें संघनित होकर बारिश का रूप लेती हैं।
मौसम के अनुसार क्लाउड सीडिंग का समय
यह प्रक्रिया दोनों ही ठंडे और गर्म महीनों में की जा सकती है। निचली ऊंचाई वाले बादलों में बीज नीचे या बीच में छिड़के जाते हैं, जबकि उच्च ऊंचाई वाले बादलों में जहां तापमान शून्य से नीचे होता है, बीज ऊपर छिड़के जाते हैं।
भारत में इसकी प्रभावशीलता
CAIPEE के अनुसार, भारत में केवल कुछ क्षेत्रों में ही क्लाउड सीडिंग संभव है। दिल्ली के ऊपर बादल की बीज योग्य स्थिति अभी भी परीक्षणाधीन है। 1970 के दशक में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान ने इस तकनीक का प्रयोग किया था, लेकिन कोई निर्णायक परिणाम नहीं मिल पाया। शुरुआती अनुभव में बारिश में लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी।
प्राकृतिक और कृत्रिम बारिश में फर्क
प्राकृतिक और कृत्रिम बारिश के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से बताना आसान नहीं है। हालांकि, आधुनिक डेटा-संचालित मॉडल बादल की प्रक्रियाओं और बीज डालने के प्रभाव का अनुमान लगा सकते हैं। इन अनुमानों का सत्यापन ग्राउंड पर और एयर-बेस्ड उपकरणों से किया जाता है, जिससे इस तकनीक की प्रभावकारिता का आकलन संभव होता है।










