अलीनगर सीट पर मैथिली ठाकुर की चुनावी चुनौती
दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट से लोकगायिका और बीजेपी की नेता मैथिली ठाकुर का चुनाव मैदान में उतरना आसान नहीं है। इस सीट पर उनकी जीत के लिए तीन महत्वपूर्ण समीकरण निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। पिछले चुनावों के अनुभव और जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए, यह समझना जरूरी हो जाता है कि क्यों इस बार उनकी राह आसान नहीं है।
पिछले चुनाव का समीकरण और वर्तमान स्थिति
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में अलीनगर सीट पर एनडीए को कड़ा मुकाबला मिला था। उस समय बीजेपी ने मिश्रीलाल यादव को टिकट दिया था, जिन्होंने करीब 3101 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। उस चुनाव में यादव वोट बैंक और ब्राह्मण वोट दोनों का समर्थन एनडीए को मिला था। उस समय, इस सीट पर बीजेपी का दावा था कि उनके पास मजबूत उम्मीदवार नहीं था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है।
मिश्रीलाल यादव का राजनीतिक सफर और सीट का इतिहास
अलीनगर सीट का इतिहास आरजेडी का गढ़ रहा है। परिसीमन के बाद यह सीट अस्तित्व में आई और पहले यहां कांग्रेस के प्रभावशाली नेता जैसे ब्राह्मण चेहरे सक्रिय थे। 2008 में इस सीट का भूगोल बदला और सामाजिक समीकरण भी। बाद में, अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे नेताओं ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की। 2010 और 2015 के चुनाव में उन्होंने सफलता हासिल की। 2020 में आरजेडी ने ब्राह्मण वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए बिनोद मिश्रा को उम्मीदवार बनाया, लेकिन बीजेपी ने यादव वोट बैंक को अपने पक्ष में कर लिया।
जातीय समीकरण और चुनावी रणनीति
अलीनगर में यादव और ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है। यदि आरजेडी यादव वोट बैंक को एकजुट रखने के साथ-साथ ब्राह्मण वोट में सेंध लगाने में सफल हो जाती है, तो उसकी जीत के आसार बढ़ सकते हैं। वहीं, बीजेपी ने इस बार ब्राह्मण वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए मैथिली ठाकुर जैसे लोकप्रिय चेहरे पर भरोसा जताया है। ठाकुर जाति से ब्राह्मण हैं और हर वर्ग में उनकी लोकप्रियता है, जिससे बीजेपी को उम्मीद है कि वह महिलाओं और विभिन्न जातियों का समर्थन हासिल कर सकती हैं।










