रमा एकादशी का पावन पर्व और इसकी महत्ता
रमा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहार है, जो भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखता है। इस दिन भक्तगण पूरे दिन व्रत रखते हैं और अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करते हैं। मान्यता है कि यदि श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान नारायण और माता लक्ष्मी की पूजा की जाए, तो भगवान विष्णु की अनंत कृपा सदैव बनी रहती है। यह व्रत श्रद्धालुओं के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाने का प्रतीक माना जाता है।
प्राचीन कथा और व्रत का महत्व
प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय में मुचकुंद नाम का राजा था, जो भगवान नारायण का अत्यंत भक्त था। उसकी एक पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। राजा ने अपनी बेटी का विवाह शोभन नामक युवक से किया। शादी के बाद चंद्रभागा अपने पति के साथ अपने मायके आई, जहां रमा एकादशी का व्रत आने वाला था। उस समय वह जानती थी कि उसके पिता के राज्य में इस दिन सभी व्रत रखते हैं, जिसमें न तो कोई भोजन करता है और न ही जानवर।
व्रत के दौरान हुई घटना और उसकी सीख
राजा ने एक दिन पहले ही घोषणा कर दी कि रमा एकादशी का व्रत है, जिसमें नगर के सभी निवासी बिना भोजन के रहेंगे। यह सुनकर शोभन, जो कमजोर स्वभाव का था, चिंतित हो गया। उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह इस व्रत को नहीं निभा सकता क्योंकि उसकी कमजोरी है। चंद्रभागा ने समझाया कि इस दिन कोई भी अन्न या पानी नहीं पीता, और यदि वह व्रत करेगा तो उसे भी कठिनाई होगी। उसने सुझाव दिया कि यदि वह व्रत नहीं कर सकता तो कहीं दूर चला जाए।
शोभन ने व्रत का पालन किया, लेकिन पूरे दिन भूख और कमजोरी से जूझता रहा। रात को जागते समय उसकी स्थिति और भी खराब हो गई, और सुबह उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना से पूरे नगर में शोक का माहौल छा गया। बाद में, व्रत के प्रभाव से शोभन को दिव्य नगर और स्वर्ण रत्नों से सजा हुआ सुंदर स्थान मिला।
व्रत का फल और दिव्य नगर का दर्शन
शोभन की मृत्यु के बाद, उसे मंदराचल पर्वत पर एक दिव्य नगर प्राप्त हुआ, जो सोने और रत्नों से भरा था। एक ब्राह्मण, सोम शर्मा, जो तीर्थयात्रा पर था, ने उस नगर को देखा और पहचान लिया। उसने बताया कि यह नगर रमा एकादशी के व्रत के कारण ही मिला है। ब्राह्मण ने पूछा कि यह नगर क्यों अस्थिर है, तो शोभन ने कहा कि उसने व्रत पूरी श्रद्धा से नहीं किया था। उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह इस नगर को स्थायी बनाने के लिए उसकी सहायता करे।
पत्नी का प्रयास और नगर का स्थायी स्वरूप
ब्राह्मण ने वापस जाकर चंद्रभागा को सारी बातें बताई। सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुई और अपने पति से मिलने के लिए तैयार हो गई। वह वामदेव ऋषि के आश्रम गई, जहां ऋषि ने मंत्रों से उसका अभिषेक किया। इस विधि से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह शोभन के नगर पहुंची। दोनों पति-पत्नी ने मिलकर उस नगर में सुख-शांति से जीवन बिताया। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए व्रत का फल सदैव शुभ होता है।









