राधा कुंड का धार्मिक महत्व और इतिहास
अहोई अष्टमी के अवसर पर राधा कुंड की पूजा का विशेष महत्व है, जो देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। इस दिन लोग पवित्र स्नान कर भगवान की आराधना में लीन हो जाते हैं। माना जाता है कि राधा कुंड में स्नान करने से पापों का नाश होता है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस पवित्र स्थल का इतिहास भी अत्यंत प्राचीन और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है।
राधा कुंड का निर्माण और पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा कुंड का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी से है। कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर नामक दैत्य का वध किया, उस समय उन पर गौ हत्या का आरोप लगा। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने अपनी बांसुरी से जमीन पर प्रहार कर एक कुंड का निर्माण किया और उसमें स्नान किया। राधा रानी ने भी अपने कंगन से एक और कुंड बनवाया, जिसे आज कंगन कुंड के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि अहोई अष्टमी के दिन इन दोनों कुंडों का जन्म हुआ था।
राधा कुंड की स्थिति और धार्मिक महत्व
राधा कुंड उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में गोवर्धन पर्वत के पास स्थित है। यह स्थान राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ा एक पवित्र तीर्थ स्थल है। इस स्थल का धार्मिक महत्व इस बात से भी जुड़ा है कि यहां स्नान करने से संतान प्राप्ति, जीवन में सुख-समृद्धि और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। खासतौर पर अहोई अष्टमी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्योदय तक का समय स्नान के लिए सबसे शुभ माना जाता है।









