जंतर-मंतर का ऐतिहासिक स्थान और प्रदर्शन का बदलाव
दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की परंपरा अब बदलने जा रही है। गृह मंत्रालय की एक समिति ने इस स्थल को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाकर तीन नई जगहों पर विरोध प्रदर्शन करने की सिफारिश की है। यह कदम उस स्थान की ऐतिहासिक महत्ता को चुनौती देता है, जहां पिछले तीन दशकों में कई बड़े आंदोलनों ने जन्म लिया।
जंतर-मंतर का नाम देशभर में विरोध की आवाज के रूप में जाना जाता है, जहां से उठने वाली आवाजें सरकार के कानों तक पहुंचने का प्रयास करती थीं। यहां अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन, निर्भया बलात्कार मामले के बाद न्याय की मांग, और अन्य कई बड़े आंदोलन हुए हैं। अब सवाल उठता है कि जब प्रदर्शन के लिए नई जगहें तय होंगी, तो क्या वे भी उतनी ही प्रभावशाली और सरकार तक पहुंचने में सक्षम होंगी?
प्राचीन विरोध स्थलों से वर्तमान बदलाव तक का सफर
जंतर-मंतर से पहले दिल्ली में विरोध का मुख्य केंद्र बोट क्लब था, जो संसद भवन और इंडिया गेट के बीच स्थित था। 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का बड़ा आंदोलन इसी जगह हुआ था, जिसमें लगभग पांच लाख किसान बैलगाड़ियों और पशुओं के साथ पहुंचे थे। इस आंदोलन ने दिल्ली की व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला।
इसके बाद, 1993 के आसपास, जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन का नया केंद्र माना गया। यहां से देशभर के लोग अपनी मांगें लेकर आते थे। 2011 में अन्ना हजारे का आंदोलन, 2012 में निर्भया बलात्कार के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रदर्शन, और 2013 में नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे बड़े आंदोलन इसी स्थल से जुड़े हैं। इन आंदोलनों ने जंतर-मंतर को देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले विरोध का साझा मंच बना दिया।
नई प्रदर्शन स्थलों की पहचान और उनके पीछे का मकसद
गृह मंत्रालय की समिति ने तीन नए प्रदर्शन स्थलों की सिफारिश की है। इनमें से एक है रामलीला मैदान, जो ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह मैदान महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं का गढ़ रहा है। 1975 में जयप्रकाश नारायण ने इसी मैदान से इंदिरा गांधी के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था।
दूसरा स्थान है बुराड़ी ग्राउंड, जो बाहरी दिल्ली में स्थित है और संसद से लगभग 21 किलोमीटर दूर है। यह 59 एकड़ में फैला है और यहां एक लाख से अधिक लोगों के जुटने की क्षमता है। हालांकि, संसद से दूरी के कारण यहां होने वाले प्रदर्शन सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने में बाधा बन सकते हैं।
तीसरा स्थान है पूर्वी दिल्ली का CBD ग्राउंड, जो संसद से लगभग 13 से 14 किलोमीटर दूर है। यह पहले मेले और समारोहों के लिए प्रयोग होता रहा है, लेकिन अब इसे प्रदर्शन स्थलों के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है।
प्रदर्शन स्थलों में बदलाव के पीछे क्या कारण हैं?
इन नए स्थलों की दूरी पर नजर डालें तो रामलीला मैदान को छोड़कर बाकी दोनों स्थान संसद से काफी दूर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से क्यों हटाया गया है। क्या यह किसी हाल के आंदोलन या सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा है? या फिर राजधानी में विरोध प्रदर्शन के स्थानों की नीति में बदलाव हो रहा है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है।
मजेदार बात यह है कि जंतर-मंतर का निर्माण 1724 में महाराजा जयसिंह द्वितीय ने खगोलीय अध्ययन के लिए कराया था। समय के साथ यह स्थान विरोध प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र बन गया। अब जब इसकी जगह नए स्थलों की सिफारिश की गई है, तो यह सवाल भी उठता है कि क्या ये नए स्थान भी आंदोलनकारियों को वही पहुंच और पहचान दे पाएंगे, जो जंतर-मंतर ने दी थी।
यदि जंतर-मंतर से प्रदर्शन बंद होते हैं, तो आंदोलनकारियों को अपनी मांगें नए स्थानों पर उठानी होंगी। लेकिन क्या ये स्थान भी उतनी ही प्रभावी ढंग से सरकार तक अपनी आवाज पहुंचा पाएंगे? 1993 में छात्र आंदोलन से जुड़ी पहचान बनाने वाला यह स्थल अब शायद इतिहास बन जाएगा। आने वाले दिनों में ही पता चलेगा कि क्या ये बदलाव आंदोलन की ताकत को कम कर देंगे या नहीं।










