उज्जैन में मुस्लिम महिला का पितृ तर्पण और सामाजिक चर्चा
उज्जैन के रामघाट पर शिप्रा नदी के किनारे, सर्व पितृ अमावस्या के अवसर पर हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। इस दिन हिंदू परंपराओं के अनुसार, लोग तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म कर अपने पूर्वजों को सम्मानित करते हैं। इसी बीच, एक महिला घाट पर पहुंची और अपने पूर्वजों के लिए जल अर्पित कर तर्पण की रस्में निभाई। यह सामान्य धार्मिक अनुष्ठान था, लेकिन इस बार इसमें एक खास बात जुड़ी थी, जिसने पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना दिया।
मुस्लिम महिला का तर्पण और उसकी सामाजिक प्रतिक्रिया
यह महिला हैं नाजिया इलाही खान, जो एक मुस्लिम समुदाय से हैं और पेशे से वकील हैं। उन्होंने 10 अक्टूबर को उज्जैन के रामघाट पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया। इस अनुष्ठान के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि तर्पण करने के बाद उनका मन हल्का हो गया है। नाजिया ने अपने जीवन के 35 वर्षों में लिए गए फैसलों में से इस तर्पण को सबसे खास बताया। उन्होंने यह भी कहा कि अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना करना उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था।
धार्मिक परंपराओं का सम्मान और संविधान का समर्थन
नाजिया ने अपने इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी का जिक्र भी किया और उसके लिए क्षमा याचना की। उन्होंने कहा कि तर्पण और श्राद्ध कर्म हिंदू परंपराओं का हिस्सा हैं, और इनका पालन हर व्यक्ति अपनी इच्छा से कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है। अपने अनुभव साझा करते हुए, नाजिया ने कहा कि गया (Gaya) जैसे धार्मिक स्थलों पर भी विभिन्न समुदाय के लोग अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान सभी के लिए खुला है।









