दिल्ली में दवाओं की कीमतों का जटिल मामला
दिल्ली के दवा बाजार में पहुंचकर हमने जीवनरक्षक और कैंसर की दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और थोक मूल्य (PTR) के बीच मौजूद अंतर को बारीकी से जांचा। दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन के महासचिव ने बताया कि दवाओं की कीमतों का यह मुद्दा काफी पुराना है। यह समस्या केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग सभी प्रकार की दवाओं में देखने को मिलती है।
दवाओं की कीमतों में असमानता का कारण
आशीष ग्रोवर ने स्पष्ट किया कि दवाओं की कीमतों का यह विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। उन्होंने कहा कि जेनेरिक दवाओं पर अक्सर MRP बहुत अधिक छपा होता है। उनका यह भी कहना था कि हम ट्रेडर्स हैं और हमारा मार्जिन बहुत ही कम होता है, केवल दो से पांच प्रतिशत के बीच। असली समस्या रिटेल स्तर पर उत्पन्न होती है, जहां डिस्काउंटिंग का चलन है, जबकि होलसेल में ऐसा नहीं होता।
ग्रोवर ने यह भी बताया कि जब दवा की कीमत और उसे MRP पर बेचा जाता है, तो इन दोनों के बीच का चैनल ही इस कीमत के अंतर का मुख्य कारण बनता है।
कैंसर मरीजों की परेशानियों और अदालत का रुख
दिल्ली कैंसर इंस्टीट्यूट में कैंसर से पीड़ित मरीजों और उनके देखभाल करने वालों से बातचीत की गई। इन परिवारों ने इलाज के खर्च, महंगी दवाओं और रोजमर्रा की चुनौतियों को लेकर अपनी परेशानियों को साझा किया। गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए दवाओं का खर्च एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
आजतक ने इस जटिल मुद्दे को जमीन पर समझने का प्रयास किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान उठाया था। अदालत ने जीवनरक्षक दवाओं की उच्च MRP और PTR के बीच मौजूद भारी अंतर पर चिंता व्यक्त की थी। साथ ही, इसे मरीजों के साथ धोखाधड़ी और करदाताओं के साथ अन्याय से जोड़ते हुए सवाल उठाए थे।
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 2013 के तहत दवाओं की कीमतों के नियमन और गैर-अनुसूचित दवाओं के बड़े हिस्से के मुद्दे को उठाया था। अदालत ने जन औषधि केंद्रों पर जरूरी दवाओं की उपलब्धता न होने की स्थिति में आम जनता को होने वाली कठिनाइयों पर भी सवाल किए। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को तय की गई है।










