मध्यप्रदेश में डेयरी सेक्टर का विकास और नस्ल सुधार की दिशा
मध्यप्रदेश सरकार ने डेयरी उद्योग को मजबूत बनाने के लिए वैज्ञानिक पशुपालन और नस्ल सुधार पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। इस पहल के तहत सेक्स सॉर्टेड सीमेन और कृत्रिम गर्भाधान (AI) को प्रमुख रणनीतियों के रूप में अपनाया गया है। इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल के पशुओं की संख्या बढ़ाना, दूध उत्पादन में वृद्धि करना और पशुपालकों की आय को बेहतर बनाना है।
सेक्स सॉर्टेड सीमेन का उपयोग और नस्ल सुधार में प्रगति
प्रदेश में नस्ल सुधार के लिए सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। जानकारी के अनुसार, इस तकनीक से लगभग 90 प्रतिशत बछियों का जन्म होने की संभावना रहती है। वर्तमान में प्रदेश में कुल कृत्रिम गर्भाधान का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इस उन्नत तकनीक का उपयोग कर किया जा रहा है। भोपाल स्थित केंद्रीय वीर्य केंद्र में गिर, साहिवाल, थारपारकर और मुर्रा जैसी उन्नत नस्लों के वीर्य का उत्पादन किया जा रहा है।
कृत्रिम गर्भाधान और दूध उत्पादन में बढ़ोतरी
कृत्रिम गर्भाधान के क्षेत्र में सरकार का लक्ष्य तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान वित्त वर्ष में 47.50 लाख AI का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जबकि पिछले वर्ष करीब 28 लाख AI किए गए थे। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच ही 10.5 लाख से अधिक कृत्रिम गर्भाधान हो चुके हैं। अगले पांच वर्षों में इस कवरेज को 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का उद्देश्य है।
दूध संकलन में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। पिछले डेढ़ वर्ष में प्रदेश का दैनिक दूध संग्रह 8.73 लाख किलोग्राम से बढ़कर जुलाई 2026 में लगभग 12 लाख किलोग्राम प्रतिदिन हो गया है। सरकार का लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में मध्यप्रदेश को ‘मिल्क कैपिटल’ बनाया जाए, जिसके लिए 26 हजार दुग्ध सहकारी समितियों की स्थापना की योजना है।
21वीं पशु गणना के आंकड़ों के अनुसार, उन्नत नस्ल के पशुओं की संख्या पिछले आंकड़ों की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। साथ ही, देशी और गैर-प्रमाणित मवेशियों की उत्पादकता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 में प्रति पशु दूध उत्पादन 927 किलो था, जो 2024-25 में बढ़कर 1,343.2 किलो हो गया है। भैंसों की उत्पादकता 1880 से बढ़कर 2365.2 किलो और गाय का औसत दूध उत्पादन 1648 से बढ़कर 2251 किलो प्रति वर्ष हो गया है।
मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता भी बढ़ी है। यह आंकड़ा अब 550 ग्राम प्रतिदिन से बढ़कर 707 ग्राम प्रतिदिन हो गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत 485 ग्राम है। नस्ल सुधार, बेहतर पोषण, रोग नियंत्रण और वैज्ञानिक पशुपालन इन सुधारों के मुख्य कारण हैं।










