आरएसएस के संगठनात्मक स्वतंत्रता पर मोहन भागवत का बयान
अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर चल रहे विवाद के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ से जुड़े विभिन्न संगठन स्वतंत्र रूप से अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह धारणा पूरी तरह गलत है कि आरएसएस इन संगठनों को केंद्रीय स्तर पर निर्देशित करता है या रिमोट कंट्रोल के माध्यम से संचालित करता है।
संघ और उसके संगठनों के बीच स्वायत्तता का महत्व
भागवत ने अपने भाषण में कहा कि अक्सर लोगों में यह गलतफहमी रहती है कि संघ के सभी संबंधित संगठन सीधे आरएसएस के नियंत्रण में हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का कार्यप्रणाली और संगठनात्मक संरचना ऐसी नहीं है। उन्होंने कहा, “संघ का क्या है, लोगों को गलतफहमी होती है। इतने सारे संगठन हैं, उनमें अनेक स्वयंसेवक हैं, और विभिन्न गतिविधियों का संचालन होता है। लोग मानते हैं कि संघ ही सब कुछ नियंत्रित करता है, लेकिन यह पूरी तरह गलत है। संघ की कार्य-रचना में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर विवाद गरमाया हुआ है, और विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सवाल उठा रहा है। हालांकि भागवत ने अपने भाषण में किसी संगठन या विवाद का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को मौजूदा घटनाक्रम के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब उनसे चढ़ावे की चोरी से संबंधित सवाल पूछा गया, तो उन्होंने केवल ‘राम-राम’ कहकर टाल दिया।
संघ की विचारधारा और वैश्विक प्रभाव
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने संघ के कार्यों और उसकी विचारधारा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के कई देशों से लोग संघ के कार्यों को देखने आते हैं। उन्होंने कहा कि पांच महाद्वीपों से आए लोग संघ के प्रशिक्षण और गतिविधियों का अध्ययन कर चुके हैं। अधिकांश ने यह इच्छा व्यक्त की है कि उन्हें भी ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे अपने देशों के युवाओं को भी इसी तरह तैयार कर सकें। भागवत ने यह भी कहा कि संघ का उद्देश्य केवल व्यक्तित्व विकास तक सीमित नहीं है। संगठन का मुख्य लक्ष्य ऐसे चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना है, जो समाज और देश के विकास में योगदान दें। वर्तमान में दुनिया भारत की ओर आशा भरी नजरों से देख रही है। उनके अनुसार, विश्व के अनेक विचारक मानते हैं कि भविष्य में भारत मानवता को नई दिशा दिखाने में सक्षम हो सकता है। इसके लिए जरूरी है कि भारत अपने सांस्कृतिक मूल्यों और मजबूत राष्ट्रीय चरित्र के आधार पर आगे बढ़े और एक शक्तिशाली, गौरवशाली राष्ट्र बने।









