बिहार चुनाव की तिथियों का ऐलान और राजनीतिक माहौल
बिहार में चुनाव आयोग ने आज विधानसभा चुनाव की मतदान तिथियों की घोषणा कर दी है। मतदान दो चरणों में होगा, पहला चरण छह नवंबर और दूसरा 11 नवंबर को आयोजित किया जाएगा। परिणाम 14 नवंबर को घोषित किए जाएंगे। इस समय राजनीतिक दलों के बीच जीवन-मरण का मुकाबला शुरू हो चुका है। हालांकि, विभिन्न सर्वेक्षण और आंकड़ों में एनडीए (NDA) का समीकरण मजबूत दिख रहा है, लेकिन इंडिया ब्लॉक (India Block) को भी नजरअंदाज करना एक बड़ी भूल होगी। विभिन्न ओपिनियन पोल्स के अनुसार, एनडीए और महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-वाम दल) के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है, जिससे चुनाव बेहद कांटे का मुकाबला बन चुका है।
जातिगत समीकरण और वोट बैंक का खेल
बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं, और आगामी चुनाव में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। एनडीए (बीजेपी, जेडीयू, एलजेपी) को सवर्ण जातियों (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ) का मजबूत समर्थन मिल रहा है, जो परंपरागत रूप से बीजेपी का आधार हैं। इसके अलावा, अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और अनुसूचित जाति (एससी) का बड़ा हिस्सा, विशेष रूप से पासवान (5%) समुदाय, एनडीए की ओर झुका हुआ है। जेडीयू का कुर्मी-कोइरी (8%) वोट बैंक नीतीश कुमार के साथ बना हुआ है। वहीं, महागठबंधन का मुख्य वोट बैंक मुस्लिम-यादव (17%+14%) है, जो आरजेडी का मजबूत आधार है। तेजस्वी यादव की युवा अपील और रोजगार के मुद्दे यादव और मुस्लिम वोटों को एकजुट कर रहे हैं।
सर्वे और चुनावी समीकरण का विश्लेषण
हाल के सर्वेक्षण और विश्लेषण बताते हैं कि एनडीए के पक्ष में जातिगत समीकरण मजबूत हो रहे हैं, लेकिन महागठबंधन भी अपने कोर वोटरों को बनाए रखने में सक्षम है। एनडीए को सवर्ण जातियों, ईबीसी और दलित समुदाय का समर्थन मिल रहा है, जिनमें पासवान समुदाय भी शामिल है। नीतीश कुमार की वेलफेयर योजनाओं जैसे महिला रोजगार योजना और बेरोजगारी भत्ता ने ईबीसी और महिलाओं का समर्थन बढ़ाया है। दूसरी ओर, महागठबंधन का मुख्य आधार मुस्लिम-यादव समीकरण है, जो अपने वोट बैंक को मजबूत कर रहा है। 2020 में महागठबंधन को 32 प्रतिशत वोट मिला था, जो 2024 में बढ़कर लगभग 36 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।
आम चुनावी माहौल और चुनावी रणनीतियां
बिहार में पिछले 20 वर्षों से सत्ता में रहने वाली नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। हालांकि, सरकार की कुछ कल्याणकारी योजनाओं ने इस प्रभाव को कम करने का प्रयास किया है। कई सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि जनता बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भूमि विवाद और कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति से नाराज है। नीतीश कुमार की उम्र (74 वर्ष), स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और बार-बार गठबंधन बदलने की नीति उनकी लोकप्रियता को प्रभावित कर रही है। इसके बावजूद, वृद्धावस्था पेंशन में वृद्धि, महिलाओं के स्वरोजगार के लिए अनुदान, मुफ्त बिजली और महिला सशक्तिकरण योजनाओं ने समर्थकों का समर्थन बनाए रखा है। इन कदमों से कोर वोटरों जैसे ईबीसी और महिलाओं का समर्थन मजबूत हो रहा है, जिससे सरकार के खिलाफ असंतोष कम हो रहा है।
फ्रीबीज और चुनावी लाभ का समीकरण
2025 के विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए सरकार की फ्रीबी योजनाएं वोटरों को लुभाने का एक महत्वपूर्ण हथियार बन सकती हैं। महिलाओं को 10,000 रुपये का स्वरोजगार अनुदान, 125 यूनिट मुफ्त बिजली, बेरोजगार युवाओं को भत्ता, पेंशन में वृद्धि और 1 करोड़ नौकरियों का वादा इन योजनाओं में शामिल हैं। ये कदम मुख्य रूप से महिलाओं, युवाओं और गरीब परिवारों को लक्षित कर रहे हैं, जो एंटी-इंकंबेंसी के बावजूद प्रो-इंकंबेंसी का माहौल बना सकते हैं। हाल के ओपिनियन पोल्स में एनडीए को 131 से 158 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि महागठबंधन को 66 से 103 सीटें मिल सकती हैं। महिलाओं के वोट शेयर में बढ़ोतरी से एनडीए को 175 सीटें तक मिल सकती हैं।
नीतीश कुमार की वादों और चुनावी रणनीति
नीतीश कुमार ने 20 से अधिक वादे किए हैं, जिनमें 75 लाख महिलाओं को 10,000 रुपये का डीबीटी, आशा-ममता कार्यकर्ताओं का मानदेय दोगुना करने और छोटे उद्योगों के लिए सब्सिडी शामिल हैं। इन योजनाओं का सीधा लाभ 1.67 करोड़ परिवारों को पहुंचेगा, विशेष रूप से ईबीसी, दलित और महिलाओं को, जो एनडीए का मुख्य वोट बैंक हैं। 2020 में महिलाओं के उच्च मतदान ने नीतीश को फायदा पहुंचाया था, और अब 80 लाख महिलाओं को 10,000 रुपये का ट्रांसफर इस ट्रेंड को और मजबूत कर रहा है। सर्वेक्षण भी दर्शाते हैं कि नीतीश का महिलाओं से व्यक्तिगत जुड़ाव इन योजनाओं के कारण और गहरा हो गया है।










