दिल्ली हाई कोर्ट में अरविंद केजरीवाल का मुकदमा और जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का फैसला
13 अप्रैल को दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की दलीलों को ध्यान से सुना। अंत में उन्होंने कहा, “आपने अपनी बात बड़े ही प्रभावशाली ढंग से रखी है। आप वकील होना चाहिए।” इस पर केजरीवाल का जवाब था, “मैं फिलहाल जो कर रहा हूं, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूं।” यह सुनवाई उस समय हुई जब केजरीवाल ने अपने खिलाफ चल रहे मामले में अपनी राय व्यक्त की।
केजरीवाल की याचिका और कोर्ट का निर्णय
20 अप्रैल को जब अरविंद केजरीवाल तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन के लिए प्रचार कर रहे थे, उसी दिन दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने उनके रिक्युजल (अपील से हटने) की याचिका पर अपना फैसला सुनाया। वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से हुई इस सुनवाई में जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल की दलीलों पर सवाल उठाए और याचिका खारिज कर दी। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब जस्टिस शर्मा ही दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस की सुनवाई करेंगी, जो सीबीआई की उस अपील पर हो रही है जिसमें जांच एजेंसी ने दिल्ली के स्पेशल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। उस कोर्ट ने केजरीवाल समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।
जज की निष्पक्षता और आरोपों पर न्यायिक दृष्टिकोण
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि अभी तक केजरीवाल पर कोई आरोप साबित नहीं हुआ है और वह केस से बाहर हो चुके हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या कोई व्यक्ति जो डर रहा हो कि फैसला उसके खिलाफ आ सकता है, कोर्ट को ‘अग्नि परीक्षा’ देने को कह सकता है। जज ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्णय नहीं देता, तब तक किसी जज की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का निर्णय ऊपरी अदालत ही ले सकती है, वादी नहीं। इस तरह, कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी नेता का न्यायिक योग्यता का फैसला केवल उच्च न्यायालय ही कर सकता है।










