पटना हाई कोर्ट ने बेगूसराय की संदिग्ध मौत मामले में जांच का रुख बदला
पटना हाई कोर्ट ने बेगूसराय की रिंकू कुमारी की संदिग्ध मौत के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए स्थानीय पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पुलिस की आत्महत्या की थ्योरी को खारिज कर मामले की पुनः जांच के आदेश दिए हैं। न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष और सही जांच का अधिकार हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने प्रारंभिक जांच में हुई गंभीर खामियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जांच को गलत दिशा में ले जाया गया था।
विशेष जांच दल की नियुक्ति और जांच की दिशा
अदालत ने इस मामले की जांच वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विकास वैभव को सौंपने का निर्देश दिया है, जिनके नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश असामान्य है क्योंकि पहली बार उच्च न्यायालय ने किसी अधिकारी पर सार्वजनिक रूप से भरोसा जताते हुए सीधे जांच का जिम्मा सौंपा है। विकास वैभव ने कहा कि वह अदालत के भरोसे पर खरा उतरने का प्रयास करेंगे। वे ‘लेट्स इंस्पायर बिहार’ नामक सामाजिक पहल भी चलाते हैं, जो शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा देने का काम करता है।
परिवार के आरोप और मामले की नई दिशा
यह मामला तेजस्विनी कुमारी की याचिका पर सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने शुरुआत से ही मामले को कमजोर करने का प्रयास किया। परिवार का दावा था कि यह पूर्व नियोजित हत्या है, जबकि पुलिस ने इसे आत्महत्या बताते हुए बिना पर्याप्त साक्ष्यों के क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। याचिका में यह भी कहा गया कि रिंकू कुमारी ने जमीन के सौदे के लिए दो पड़ोसियों को लगभग 15 लाख रुपये अग्रिम में दिए थे। पैसे लौटाने में देरी के कारण पंचायत में 4 अप्रैल 2021 को भुगतान का वादा हुआ था। उसी दिन रिंकू स्कूल के लिए निकलीं, लेकिन बाद में उनके शव को संदिग्ध हालत में पाया गया। शव की स्थिति ने भी आत्महत्या की थ्योरी पर सवाल खड़े किए, क्योंकि शरीर पर मिट्टी और धूल लगी थी और गले में फंदा संदिग्ध स्थिति में था। परिवार का आरोप है कि प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए पुलिस ने एफआईआर में उनके नाम शामिल नहीं किए।
करीब पांच वर्षों से न्याय की खोज कर रही तेजस्विनी कुमारी के लिए अदालत का यह आदेश नई उम्मीद लेकर आया है। अब एसआईटी जांच पर निगाहें टिकी हैं, जो पुराने साक्ष्यों की पुनः जांच करेगी, छूटे हुए कड़ियों को जोड़ेगी और यह पता लगाएगी कि क्या इस मामले में कोई आपराधिक साजिश थी। अदालत ने संकेत दिया है कि पहले की जांच में शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा की जा सकती है। यह फैसला न केवल एक पुराने मामले को नई दिशा देता है, बल्कि बिहार में पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।











