दिल्ली में गैस सिलेंडर की भारी किल्लत का फायदा उठाकर माफिया सक्रिय
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच दिल्ली में गैस सिलेंडर की गंभीर कमी का लाभ उठाते हुए अवैध गैस माफिया ने अपने कारोबार को तेज कर दिया है। आजतक के विशेष स्टिंग ऑपरेशन में खुलासा हुआ है कि घरेलू सिलेंडर जिसकी कीमत 913 रुपये है, दिल्ली की गलियों में खुलेआम 4000 से 4500 रुपये तक में बेचा जा रहा है। यह अवैध व्यापार अलीपुर से लेकर मौजपुर जैसे इलाकों में पुलिस और प्रशासन की आंखों के सामने ही चल रहा है, जहां गरीब मजदूरों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे पांच गुना अधिक कीमत वसूली जा रही है।
सिलेंडर की कीमतों में हो रही जबरदस्त वृद्धि और सिस्टम की नाकामी
जब मैं मौके पर पहुंचा, तो देखा कि एक दुकान पर सिलेंडर की कीमतें अंकित थीं। मैंने दुकानदार से सीधे पूछा कि क्या सिलेंडर उपलब्ध कराएंगे, तो उसने बिना हिचकिचाहट के 4300 रुपये की मांग कर दी। इस एक पल में स्पष्ट हो गया कि घरेलू सिलेंडर जिसकी कीमत 913 रुपये है, यहां 4300 रुपये में बिक रहा है। यह महंगाई का मामला नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता का संकेत है।
जब मैंने मोलभाव करने की कोशिश की, तो जवाब मिला कि माल ऊपर से ही महंगा आ रहा है। इससे पता चलता है कि यह पूरा खेल ऊपर से नीचे तक जुड़ा हुआ है। इसी बीच, एक मजदूर अपनी पत्नी के साथ आया, जिसके कंधे पर खाली सिलेंडर था और चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। अंकित ने उससे 4300 रुपये नकद लिए और उसे ऐसा ट्रीट किया जैसे उसने कोई बड़ा उपकार किया हो। मजदूर अपनी पत्नी से पैसे लेकर, जो शायद उसकी कई दिनों की बचत थी, उसे दे रहा था।
सिस्टम की मिलीभगत और अवैध गैस कारोबार का खुलासा
पैसे गिनने के बाद, अंकित ने सिलेंडर मजदूर को सौंप दिया। यह केवल एक लेन-देन नहीं, बल्कि मजबूरी का खुला शोषण था। हमारा कैमरा यह सब रिकॉर्ड कर रहा था, और मन में एक बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मेरी बारी थी, मेरे पास इंडेन का खाली सिलेंडर था, जबकि अंकित के पास एचपी का। उसने कहा कि उसकी कंपनी अलग है और 200 रुपये अतिरिक्त जोड़ दिए। इस तरह, 4300 रुपये का सिलेंडर 4500 रुपये में तय हुआ। उसने सिलेंडर तौलकर दिया, मानो सब कुछ नियमों के तहत हो रहा हो। मैंने यूपीआई से 4500 रुपये ट्रांसफर किए और मन में सवाल था कि आखिर यह इतना खुला खेल कौन रोक रहा है। अगले दिन फिर फोन किया और दो सिलेंडर मांगे, तो जवाब मिला कि दो दे देंगे। यह सब इतनी आसानी से हो रहा था, जैसे यह कोई सामान्य व्यापार हो।
क्या यह सब बिना किसी मिलीभगत के संभव है? जांच के दौरान, मैं केक चौक पहुंचा, जहां बदनाम सीताराम मिला। उसने दो सिलेंडर के लिए 4000-4000 रुपये मांगे। उसने तुरंत अपने नेटवर्क के संजय को कॉल किया और 15 मिनट में गैस का इंतजाम कर दिया। यह कोई छोटी दुकान नहीं, बल्कि एक पूरा नेटवर्क था, जहां हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभा रहा था।
यह कहानी सिर्फ बाहरी दिल्ली तक सीमित नहीं है। जब मैं ईस्ट दिल्ली के मौजपुर इलाके में पहुंचा, तो वहां भी वही तस्वीर थी। स्टेशनरी की दुकानें, चक्की और चूल्हा ठीक करने वाली दुकानों के अंदर भी यह खेल चल रहा था। कहीं 3400 रुपये, तो कहीं 4000 रुपये में मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा था। हर सीन के साथ सवाल और गहरा होता गया कि क्या सिस्टम सच में जागरूक है या आंखें बंद कर सब देख रहा है? दिल्ली में कानून-व्यवस्था की नाक के नीचे यह अवैध गैस माफिया बेखौफ होकर काम कर रहा है। सबको नाम, पता और तरीका पता है, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? शायद इसलिए क्योंकि गरीब मजदूर ही इस खेल का सबसे बड़ा शिकार हैं, जिनकी आवाज ऊपर तक नहीं पहुंचती। यह रिपोर्ट सिर्फ एक स्टिंग ऑपरेशन नहीं, बल्कि सिस्टम की सच्चाई का आईना है।
अब सवाल यह है कि क्या यह खेल यूं ही चलता रहेगा या फिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी? जब चूल्हा महंगा हो जाता है, तो न केवल खाना बल्कि भरोसा भी जलता है।









