बिहार में सरकार के हस्तांतरण का क्रम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, और इस प्रक्रिया में नीतीश कुमार का विश्वास भी स्पष्ट रूप से झलकता है। उनका मानना है कि कार्यवाही को धीरे-धीरे ही पूरा करना बेहतर होता है। जब काम धीरे-धीरे होता है, तो उसमें स्थिरता और संतुलन बना रहता है।
2015 में जब जनता परिवार के विलय की कोशिशें चल रही थीं, तब नीतीश कुमार ने कबीर के दोहे का संदर्भ देते हुए कहा था, “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए तब फल होय।” उस समय उन्होंने बार-बार यह दोहा दोहराया और कहा कि सभी बातें अपने समय पर ही पूरी होंगी। उन्होंने भरोसा जताया कि काम अपने सही रास्ते पर है और कोई चिंता की बात नहीं है।
हाल ही में, नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंच से अपने अगले मुख्यमंत्री पद का संकेत भी दिया है। उन्होंने कहा कि वे वही काम आगे भी करते रहेंगे, और अपने सहयोगियों के साथ मिलकर नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि, अभी तक उनके मुख से कबीर का दोहा सुनने को नहीं मिला है, लेकिन उनके हाव-भाव से यही संकेत मिल रहे हैं कि वे अपने विचारों को स्पष्ट कर चुके हैं।









