मध्यप्रदेश में वंदे मातरम् को लेकर विवाद और राजनीतिक प्रतिक्रिया
मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रगान वंदे मातरम् को लेकर तीव्र विवाद उभर आया है। केंद्र सरकार के नए निर्देश के अनुसार, अब प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थान, मदरसे और सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस आदेश को तुरंत लागू करने का निर्देश देते हुए इसे स्वतंत्रता सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि बताया। वहीं, कांग्रेस के विधायक आरिफ मसूद ने इस फैसले का विरोध किया है, उनका तर्क है कि यह मजहबी आजादी के अधिकार का उल्लंघन है। भाजपा ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें पाकिस्तान जाने की सलाह दी है।
सरकार का तर्क और राजनीतिक विवाद की जड़ें
मध्यप्रदेश सरकार का कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् का मंत्र ऊर्जा का स्रोत था, और अब यह नई पीढ़ी को राष्ट्रभाव से जोड़ने का माध्यम बनेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कदम शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है। हालांकि, इस निर्णय ने राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इसे मजहबी आजादी का उल्लंघन बताते हुए अनुच्छेद 25 का हवाला दिया है। कुछ मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने भी पूरे छह छंदों को अनिवार्य करने का विरोध किया है।
मुस्लिम समुदाय और धार्मिक स्वतंत्रता पर विवाद
आरिफ मसूद ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित है। उनका तर्क है कि वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियों को लेकर विवाद है, जो उनकी मजहबी आजादी पर रोक लगाती हैं। काजी रफीक अहमद ने कहा कि मदरसों में वंदे मातरम् का अनिवार्य गायन अभी तय नहीं है, क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस कानून की समीक्षा कर रहा है। वहीं, मुस्लिम स्कॉलर मोहम्मद अख्तर काजमी ने सरकार पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्यों मजहबी मुद्दों को उठाया जा रहा है।










