भगवान शिव और चंद्रमा का रहस्यमय संबंध
भगवान शिव को शंकर, महादेव, भोलेनाथ जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। उनका हर रूप और उनसे जुड़ी हर बात रहस्यों से भरी हुई है, चाहे वह उनके शरीर पर लगा भस्म हो या माथे पर सजा चंद्रमा। कई लोग मानते हैं कि भगवान शिव अपने जटाओं में चंद्रमा को केवल एक आभूषण की तरह धारण करते हैं, लेकिन यह सही नहीं है। शिव और चंद्रमा के बीच कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से एक आज हम आपको बता रहे हैं।
पौराणिक कथा का सार
प्राचीन कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। इस प्रक्रिया में समुद्र से कालकूट नामक विष निकला, जो इतना खतरनाक था कि उसकी एक बूंद भी पूरे संसार को नष्ट कर सकती थी। विष की उपस्थिति से देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो गए। तब भगवान शिव ने आगे बढ़कर उस विष को अपने कंठ में ग्रहण कर लिया। इससे उनके शरीर में तपन होने लगी। इस स्थिति में चंद्रदेव और अन्य देवताओं ने उनसे आग्रह किया कि वे अपने सिर पर चंद्रमा को धारण करें, ताकि चंद्रमा की शीतलता उनके ताप को कम कर सके। भगवान शिव ने इस अनुरोध को स्वीकार किया और अपने जटाओं में चंद्रमा को धारण कर लिया।
शिव के सिर पर सजे चंद्रमा का प्रतीकात्मक अर्थ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव के सिर पर सजा चंद्रमा मन, नियंत्रण, समय और अमरता का प्रतीक है। यह उनके उग्र रूप के साथ संतुलन बनाए रखता है। चंद्रमा का यह प्रतीक शिव के व्यक्तित्व में स्थिरता और शक्ति का संकेत देता है, जो उनके दिव्य स्वरूप का अभिन्न हिस्सा है।










