जेएनयू में नारेबाजी का मामला: दिल्ली पुलिस का कदम और विवाद की जड़ें
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में नारेबाजी का वीडियो सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी है, जिसमें एनसीआर (National Capital Region) में एफआईआर दर्ज की गई है। इस घटना को लेकर शिक्षक संगठन सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह केवल कानून व्यवस्था का मामला है या फिर से जेएनयू की छवि धूमिल करने की साजिश रची जा रही है।
शिक्षक संगठनों का आरोप: बदनाम करने की साजिश और 2016 की यादें
जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन (JNUTA) ने इस पूरे घटनाक्रम को विश्वविद्यालय की बदनामी का सुनियोजित प्रयास बताया है। संगठन का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और दिल्ली पुलिस जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां बना रहे हैं, जिनसे जेएनयू की प्रतिष्ठा धूमिल हो और फिर से विवादों में फंस जाए। संगठन ने पुलिस की शिकायत को हास्यास्पद करार देते हुए कहा कि यह केवल नारे लगाने को अपराध बनाने का प्रयास है।
यह मामला 2016 के विवाद की याद दिलाता है, जब भी कैंपस में कथित रूप से देश विरोधी नारे लगाए जाने का आरोप लगा था। उस समय भी कन्हैया कुमार (JNUSU अध्यक्ष) और उमर खालिद की गिरफ्तारी हुई थी, और उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया था। संगठन का आरोप है कि इस बार भी मीडिया के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल कर जेएनयू के खिलाफ बदनामी अभियान चलाया जा रहा है, जबकि सच्चाई और विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक आत्मा को नजरअंदाज किया जा रहा है।
आगे की चेतावनी और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर हमला
JNUTA ने अपने 5 जनवरी 2026 के बयान में पहले ही चेतावनी दी थी कि यह घटना उन्हीं आशंकाओं को सही साबित कर रही है। संगठन का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर के माध्यम से दिल्ली पुलिस से केवल नारे लगाने के लिए एफआईआर दर्ज करने को कहा है। उनका मानना है कि इस पूरे प्रकरण का असली मकसद विरोध की आवाजों को दबाना और लोकतांत्रिक माहौल को खत्म करना है।
संगठन का कहना है कि यह कार्रवाई विश्वविद्यालय की उस लोकतांत्रिक संस्कृति को खत्म करने का प्रयास है, जो जेएनयू को एक स्वतंत्र और खुला संस्थान बनाती आई है। उनका तर्क है कि इस कदम का उद्देश्य हर तरह के विरोध को दबाना और विश्वविद्यालय की पहचान को धूमिल करना है।
वहीं, जेएनयू प्रशासन ने नारेबाजी की कड़ी निंदा की है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक X (Twitter) हैंडल पर जारी बयान में कहा गया कि विश्वविद्यालय नवाचार और विचारों का केंद्र है, और इसे नफरत की प्रयोगशाला में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन किसी भी हिंसक, गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
प्रशासन ने चेतावनी दी है कि घटना की गंभीरता को देखते हुए छात्रों के खिलाफ निलंबन, निष्कासन या स्थायी निष्कासन जैसी कार्रवाई की जा सकती है। पुलिस को दी गई शिकायत में कहा गया है कि लगभग 30 से 35 छात्रों ने नारे लगाए, जब उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज हुई थीं। प्रशासन का दावा है कि यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के दायरे में आता है।
छात्र संघ ने इन आरोपों का खंडन किया है। JNUSU अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा कि नारे वैचारिक थे और किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से निशाना नहीं बनाया गया। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पर 2002 में हुई हत्याओं के लिए जिम्मेदारी का आरोप लगाया और कहा कि देश में फासीवादी विचारधारा का अंत होना चाहिए।
टीचर्स एसोसिएशन और छात्र नेताओं का मानना है कि यह मामला फिर से उसी दिशा में जा रहा है, जहां असहमति, सवाल और विरोध को अपराध की तरह देखा जाता है। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया अकादमिक स्वतंत्रता और कैंपस में लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करने का प्रयास है।










